नयी फालतु पोष्ट


यह आखिरी खयाल मुझे डराता है। अगर हम कुदरती तौर पर अपने संस्कारों की वजह से निराशावादी हैं तो देश हमसे क्या उम्मीद कर सकता है। अच्छा है कि हमारा वक्त गुजर रहा है और मैं मानता हूं कि जो पीढ़ी हमारी जगह ले रही है, वह इतनी निराशा को अफोर्ड नहीं करना चाहेगी। वह पीढ़ी हमारी नजर में अक्खड़, खुदगर्ज, बेशर्म, बदमाश हो सकती है, लेकिन वह मुंह लटकाए रखने के कर्मकांड पर तो यकीन नहीं ही करती। भारत के भविष्य के लिहाज से यह शुभ है।

आसपास जो बुरा है, उसकी चिंता करना गलत नहीं है। इस चिंता से ही सरोकार और उपाय का रास्ता खुलता है। लेकिन निराशा में सिर हिलाते लोग इस रास्ते के राही नहीं होते। अगर हम अपनी महान चिंताओं को स्थगित करें और बेहतर चीजों के बारे में सोचें और बात करें, तो अपने वारिसों को बेहतर तालीम दे सकते हैं। हमने अपनी मेहनत या वक्त की कृपा से जो पाया, उस पर खुशी मनाने के हजार बहाने हो सकते हैं। अगर हम थोड़ा पॉजिटिव हो लें, तो हमें सांस अटकाने या गुरुओं के पीछे भागने की उतनी जरूरत नहीं रहेगी, जितनी कि आज पड़ रही है

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